
भगवान शिव के जयघोष और देवभूमि उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं के बीच शनिवार को कैलाश मानसरोवर यात्रा-2026 का शुभारंभ टनकपुर से हो गया। 51 सदस्यीय प्रथम दल के टनकपुर पहुंचने पर छोलिया नृत्य, पुष्पवर्षा, फूल-मालाओं और पारंपरिक स्वागत के साथ श्रद्धालुओं का आत्मीय अभिनंदन किया गया। पूरे शहर में “हर-हर महादेव” और “बम-बम भोले” के उद्घोष से भक्तिमय वातावरण बन गया।
शारदा पर्यटक आवास गृह (टीआरसी) में पहुंचे प्रथम दल में देश के विभिन्न राज्यों से आए 51 श्रद्धालु शामिल हैं, जिनमें 36 पुरुष, 15 महिलाएं तथा एक चिकित्सक भी दल के साथ मौजूद हैं। शाम को श्रद्धालुओं के सम्मान में उत्तराखंड की लोक संस्कृति पर आधारित रंगारंग सांस्कृतिक संध्या का आयोजन किया जाएगा, जिससे यात्रियों को देवभूमि की सांस्कृतिक विरासत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा।
इस प्रथम दल में आंध्र प्रदेश, दिल्ली, गुजरात, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सहित देश के विभिन्न राज्यों के श्रद्धालु शामिल हैं। यह दल भारत की सांस्कृतिक विविधता, राष्ट्रीय एकता और भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था का जीवंत प्रतीक बनकर टनकपुर पहुंचा है।
यात्रा दल के सबसे वरिष्ठ श्रद्धालु राजस्थान के 68 वर्षीय पुरुषोत्तम खंडेलवाल हैं, जबकि गुजरात के 21 वर्षीय हरिकृष्णा सबसे युवा यात्री हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रति आस्था हर आयु वर्ग में समान रूप से विद्यमान है।
रविवार, 5 जुलाई को प्रातः 8 बजे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी शारदा पर्यटक आवास गृह में विधिवत पूजा-अर्चना के बाद प्रथम दल को हरी झंडी दिखाकर कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए रवाना करेंगे।
मुख्यमंत्री के विशेष प्रयासों से लगातार दूसरे वर्ष टनकपुर मार्ग से कैलाश मानसरोवर यात्रा का संचालन हो रहा है। इससे सीमांत जनपद चम्पावत को धार्मिक पर्यटन के मानचित्र पर नई पहचान मिली है। साथ ही स्थानीय व्यापार, होटल व्यवसाय, परिवहन, पर्यटन और रोजगार के नए अवसर भी तेजी से विकसित हो रहे हैं।
देवभूमि उत्तराखंड की अतिथि देवो भवः की परंपरा और शिवभक्ति के अद्भुत संगम के बीच टनकपुर एक बार फिर कैलाश यात्रियों के स्वागत के लिए पूरी श्रद्धा, संस्कृति और आत्मीयता के साथ तैयार दिखाई दिया। कैलाश मानसरोवर यात्रा का यह शुभारंभ न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सीमांत क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी एक ऐतिहासिक अवसर माना जा रहा है।


